Singrauli News: लाल रंग की पॉलीथिन में एक व्यक्ति होटल से सब्जी और पूड़ी लेकर लौटा। वैढ़न बस स्टैंड में खड़ी बस में बैठकर वह पूड़ी-सब्जी बच्चों को खिलाने लगा। इसी क्रम में उसने देखा कि पॉलीथिन के रंग से पूड़ी का रंग भी लाल हो गया है, मगर उसकी परवाह किए बगैर उसने बच्चों को पूड़ी-सब्जी खिला दी। यह तो महज एक उदाहरण है। बस स्टैंड ही नहीं, जिले के हर कस्बे में खाद्य पदार्थ हों या सब्जी, फल, किराना या अन्य कोई सामग्री खुलेआम लोग हाथ में लटकाए चले आते हैं। बात इतने से ही नहीं समाप्त हो जाती है, पूड़ी-सब्जी के लिए उपयोग की गई पॉलीथिन बस से नीचे फेंकी तो आवारा मवेशी उस पर टूट पड़े और खाने के लालच में पॉलीथिन ही खा गए। यह तो कुछ मिनटों के अंदर हुआ।
उसमें लिपटी खाद्य सामग्री की वजह से गाय ने पॉलीथिन को भी खा लिया। केले या सब्जियों आदि के छिलके पॉलीथिन में भरकर फेंके जाने से पशु उसे खा लेते हैं। यह सब इसलिए बताने की जरूरत पड़ रही है कि नगर पालिक निगम क्षेत्र सहित पूरे सिंगरौली जिले में पॉलीथिन को प्रतिबंधित करने और इसके उपयोग को पूरी तरह खत्म करने के प्रयास करीब 16 साल पहले शुरू किए गए थे। वर्ष 2011 में शासन के निर्देश पर पहली बार 40 माइक्रॉन से कम की पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया गया था। इस दौरान जिले के दूसरे कलेक्टर के रूप में पदस्थ रहे पी. नरहरि ने दर्जनों बार अभियान चलाए। लोगों को जागरूक करने रैलियां निकालीं और शपथ दिलाई गई। होर्डिंग्स लगे और कुछ मौकों पर छापेमारी कर पॉलीथिन जब्त की गई। लोगों को इसके नुकसान की जानकारी देने के लिए बड़े-बड़े सेमिनार हुए, लेकिन सारी कवायद और कार्रवाई खानापूर्ति साबित हुई।
थोक विक्रेताओं और बाहर से आवक पर कार्रवाई नहीं
पॉलीथिन की रोकथाम के नाम पर फुटकर विक्रेताओं या छोटे दुकानदारों को पकड़कर जुर्माने की कार्रवाई कर दी जाती है। नगर निगम के अधिकारी फोटो खिंचाकर गाहे बगाहे पॉलीथिन की रोकथाम की कार्रवाई की खानापूर्ति कर देते हैं। थोक विक्रेताओं के गोदामों और बड़े शहरों से आने वाले कई ट्रक पॉलीथिन पर आज तक बड़ी कार्रवाई नहीं हुई। नतीजा यह है कि प्रतिबंध के बावजूद बाजार में पॉलीथिन आसानी से उपलब्ध है। इसकी रोकथाम की कवायद के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी धरातल पर हालात जस के तस हैं। आज भी बाजारों, सब्जी मंडियों व दुकानों में पॉलीथिन धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है।
जिनकी है रोकथाम की जिम्मेदारी वे बने हुए हैं बेपरवाह
हर आम व खास का आरोप है कि पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाने के लिए सक्षम अधिकारी और जिम्मेदार संस्थाएं आगे नहीं आ रही हैं। नगर पालिक निगम, जिला प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और खाद्य सुरक्षा विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं। संयुक्त कार्रवाई की ठोस रणनीति कभी नहीं बनाई गई। जिसका परिणाम है कि हर चौराहे पर पॉलीथिन में सामान बिक रहा है। हर दुकान में कई किलो अमानक पॉलीथिन उपलब्ध है।
मुख्यालय से लेकर कस्बों तक एक ही स्थिति
जिला मुख्यालय वैढ़न ही नहीं बरगवां, देवसर, चितरंगी, गोरबी, मोरवा, विंध्यनगर और नवानगर या कोई भी बाजार, कस्बे और शॉपिंग सेंटर बिना पॉलीथिन के नहीं हैं। सब्जी, किराना, फल, मीट, तैयार खाद्य सामग्री, दूध-दही तक पॉलीथिन में पैक कर दिया जाता है। उपयोग के बाद यह पॉलीथिन सड़कों नालियों तक पहुंच जाती है। जिसका दुष्परिणाम बारिश में दिखता है, जब नालियां चोक हो जाती हैं व गंदगी सड़क पर तैरती दिखती है।
क्या पॉलीथिन मुक्त नहीं हो पायेगा सिंगरौली
पॉलीथिन के उपयोग पर लाखों रुपये जुर्माने तक का प्रावधान किया गया है, मगर जिले जिस प्रकार की ढुलमुल नीति चल रही है उसके कारण हर दिन टनों पॉलीथिन उपयोग की जा रही है। दूसरे दिन वह गलियों में उड़ती व मवेशियों का निवाला बनती है। कचरा गाड़ियों के माध्यम से निस्तारण प्लांट या खुले मैदान में उड़ती नजर आती है। गर्मी शुरू हुई है और इस दौरान खाली पड़ी जमीनें, कचरे के अड्डे पॉलीथिन से अटे पड़े हैं। डेढ़ दशक का समय बीत जाने के बाद भी यदि पॉलीथिन के उपयोग को हतोत्साहित भी नहीं किया जा सका है तो यह पूरी तरह बंद हो जायेगी इसकी कल्पना कैसे की जा सकती है?
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